Friday, 24 August 2018

ये सोच के चलता जाता हूँ......

                                           
आज जीत की रात
आज मैं  क्या कहूँ
बहुत बड़ी है बात आज
मैं आजादी वाली बात लिखूँ

लिखूं गुलामी की जंजीरें
या बंदूकों की आवाज लिखूँ
When world sleeps India will awake वाला
चाचा नेहरू का आगाज़ लिखूँ

मैं लिखूँ आंसुओं वाले पन्ने
या  1857 का संग्राम लिखूँ
मैं झाँसी वाली रानी या
डलहौजी का अत्याचार  लिखूँ

मैं भूखे लोगों की लाशों पर
Lytton का दिल्ली दरबार लिखूँ
या भगत सिंह  के किस्से को
एक बार नहीं सौ बार लिखूँ


मैं खुदीराम की फांसी  या
जालियां वाला कांड लिखूँ
शायद कोई शब्द आँसुओ  से बच निकले
अगर एक भी पन्ना मैं  शहीदों के नाम लिखूँ


मैं बापू जी का चश्मा धोती
या अहिंसा की तलवार लिखूँ
तुम  मुझे  खून दो इस आजादी के बदले
नेताजी के शब्दों की ललकार लिखूँ


जब मैं दुविधा में घिर जाता हूँ
खुद को हरा सा पाता हूँ
तो मैं ये बातें खुद से कहता हूँ
खुद ही खुद को समझाता हूँ


सिर्फ वर्षों का जीवन लेकर
हम तो भूखे पेट लड़े
एक तरफ थी गोलियां
पर हम लाठी लेकर खड़े रहे


अब तू रहता है आजाद देश में
मन तू क्यों घबराता है
गाँधी सुभाष  का देश तेरा
तू किसका शोक मनाता है

ले थाम  तिरंगा हाथों में
"जय हिन्द " का नारा  सांसों में
सपनों वाल देश बनेगा तेरा
रख भरोषा मजबूत इरादों में

देख तिरंगे को लहराते
मैं मन ही मन मुस्काता हूँ
मैं क्या दे जाऊँ मातृभूमि
ये  के सोच  चलता जाता हूँ
ये सोच    के चलता जाता हूँ,ये सोच    के चलता जाता हूँ..........